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रविवार, 18 मार्च 2007

हवा की बात

मीठी-मीठी हवा ये,
चल रही थी धीरे-धीरे,
मुझे चूमा उसने धीरे से,
मछल मेरा दिल,क्यों न जाने!
बताई कुछ मुझसे आके,
शर्माई मॆं, यूं ही सुनके।
बात क्या थी, न जाने,
मछला मेरा दिल, क्यों न जाने!
खोई मॆं उस बात में,
बॆठी थी धडकते दिल लेके,
कहीं धोखा न दिया उसने,
यूं ही मुझे वह छेडे।
समझ गई मॆं झट से,
शायद आएगा "देवता" मेरे मन के,
शायद मछला मेरा दिल इसीलिए,
बात रिम-झिम हवा की सुनके।

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