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मंगलवार, 6 मार्च 2007

रिम-झिम बरसात

बरसात आई री सखी,
धरती से मीठी महक उठी |
पेड़ों औ ' वृक्षों से धूल धुली,
पत्तिया बरसात मे चमक उठीं |
कलियाँ  ऒस से भीगी, मुस्कराने लगी,
सडक के सारे नालिया भर गयी |
बून्दे बिजलियो के कमभों  मे जा रुकी,
ज़मीन ये बहुत ही शीतल हुई.
चारों तरफ़ अन्धियारा फैल गई,
पंछियाँ सब घोंसलों मे छिप गई |
खेतों मे अनाज के पौधे चमक उठी,
कहीं से एक गीत गूँज उठी |
घरो के छतो पर बारिश हुई,
खिडकियों पर झटके से गिर आई,
चारो ओर हो गयी हरियाली ही हरियाली.
ये सब देखकर मैं पुलकित  हो उठी;
अरी सखी! सुन्दर बरसात आई!
रिम-झिम, रिम-झिम बारिश आई,
सबके मन को शीतल कर गई,
ये बरसात है बहुत ही प्यारी!
                                     - "अपराजिता"

2 टिप्‍पणियां:

Archikins ने कहा…

Beautiful! What I like about this poem is that it is just a pure observation of all the transformations that the rain brings, and painted the scene vividly in front of my eyes as i read the poem!

Apperna ने कहा…

hey archikins..your comment is encouraging..thanx