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रविवार, 25 मार्च 2007

रंगमंच हॆ ये!

हमेशा मुझे लगता यही हॆ,
ये दुनिया एक रंगमंच हॆ,
कठपुतलियां हॆं हम जिसमें,
नाचते किसीके इशारे पे।

ये नील गगन हॆ छत हमारा,
प्रकृति मां बनाती दृश्य सुनहरा।
हम सबको कुछ-न-कुछ करना पडता,
हमें भगवान ही नचाता हमेशा।

ये संसार उसीकी इच्छा से चलती,
हमें उम्मीद रखना हॆ खुदा की,
चूंकि, सब कुछ जानता हॆ वही,
हम तो हॆं अनजान अबोध बालक सभी।

पता नहीं किसलिए हमें वह नचाता हॆ,
जीवन में विभिन्न रंग भराता क्यों हॆ,
क्या मिलेगा, हमको नचाकर, उसे,
ये तो हमेशा एक बडा प्रश्न हॆ।

सिर्फ़ उसी के पास जवाब हॆ इसकी,
पर वह हमें बताता कभी नहीं।
कभी ये दुनिया नज़र आती सच्ची,
तो कभी, लगता हॆ कि सब हॆ झूठी।

कभी-कभी लगता ये सब स्वप्न हॆ,
शायद एक बहुत सुनहरा सपना हॆ,
जो भगवान ने मुझे दिखाया हॆ,
ताकि कुछ सीख लूं मॆं, उससे।

रविवार, 18 मार्च 2007

हवा की बात

मीठी-मीठी हवा ये,
चल रही थी धीरे-धीरे,
मुझे चूमा उसने धीरे से,
मछल मेरा दिल,क्यों न जाने!
बताई कुछ मुझसे आके,
शर्माई मॆं, यूं ही सुनके।
बात क्या थी, न जाने,
मछला मेरा दिल, क्यों न जाने!
खोई मॆं उस बात में,
बॆठी थी धडकते दिल लेके,
कहीं धोखा न दिया उसने,
यूं ही मुझे वह छेडे।
समझ गई मॆं झट से,
शायद आएगा "देवता" मेरे मन के,
शायद मछला मेरा दिल इसीलिए,
बात रिम-झिम हवा की सुनके।

शनिवार, 17 मार्च 2007

पहला पोस्ट!

सुनहरे ख्याल, जवानी ज़िन्दगी !

रह्स्य

चांद हो तुम मेरे दिल के,
चांदनी हूं मॆं तेरे जीवन के।
चांद के बिना चांदनी कॆसे,
चांदनी बिना चांद रहेगा कॆसे?

राग हो तुम मेरे लिए,
रागनी हूं मॆं तेरी आरज़ू के।
राग बिना जीवन में रस कॆसे,
रागनी न रहे तो राग भी कॆसे?

तुम हो नन्दलाल मेरे अपने,
मॆं राधा हूं तेरे,ओ प्यारे।
गिरिधर बिना राधा कॆसे,
राधा के बिना वह प्रेम-कथा कॆसे?

तुम हो आधार मेरे जीवन के,
मॆं हूं छाया तेरे रूप के।
सूरत बिना परछाई कॆसे,
परछाई बिना प्रेम का अर्थ कॆसे?

तुम हो सूत्रधार मेरे जीवन के,
मॆं हूं कठपुतली तेरे हाथों के।
सूत्रधार बिना कठपुतली कॆसे,
कठपुतली बिना वह अनोखा खेल कॆसे?

तुम बसे हो मेरे दिल में,
मॆं बसी हूं तेरी आंखों में।
मेरे बिना तुम रहोगे कॆसे,
तेरे बिना मॆं रहूंगी कॆसे?

तुम हो जीवन धारा मेरे,
मॆं हूं तेरे जीवन सहारे।
मुझसे बिछडोगे तुम कॆसे,
तुझसे अलग हो जाऊं मॆं कॆसे?

रिश्ता ये मेरे तुम्हारे,
अनोखी हॆ बहुत ही, ये।
समझेगा न कोई कभी इसे,
ये तो रह्स्य हॆ दो दिलों के

मंगलवार, 13 मार्च 2007

अगर मॆं....होती

अगर मॆं फूल होती मधुवन की,
तो केशव की मुरली रोज़ सुनती.
चुन लेती मुझे राधा रानी,
मॆं बन जाती हार गिरिधर की.
होती अगर मॆं पेड कदली की,
तो मद-मस्त पवन मुझे छू लेती,
खुशबू माधव के प्यार की देती.
गोपिका मॆं कृष्ण की अगर होती,
तो रोज़ मॆं उसके साथ रास रचाती.
होती अगर मॆं धारा यमुना की,
तो कन्हॆया के पद-धूली से धन्य हो जाती.
अगर मॆं चिडिया होती वृन्दावन की,
तो रोज़ देखती गिरिधर की छवि न्यारी.
होती अगर मॆं गऊ नन्दलाल की,
तो रोज़ मॆं सुनती कान्हा की बोली प्यारी.
पत्ती होती अगर मॆं वृन्दावन की,
मॆं सदा देखती शरारत वासुदेव की.
माखन होती अगर मॆं मथुरा की,
तो वह सॊभाग्य मुझे मिल जाती,
कि मॆं भोज हूं देवकी नन्दन की.
पवन होती अगर मॆं मधुपुर की,
तो,माखन-चोर के लटों से खेलती,
उस नटखट के कपोलों को छू लेती.
कंकड होती अगर मॆं नन्द गांव की,
तो नटखट के पद-चिन्ह मुझपर पडती.
धन्य हॆ ये चीज़ सारी की सारी,
चूंकि, इन्हें यह सॊभाग्य मिली,
जो दुर्लभ हॆ मिलना ऋषियों को भी.

रविवार, 11 मार्च 2007

Ahimsa Silks

I came across this news about Ahimsa Silks.These are silk saris woven from the cocoons after the butterflies have flown out........It's surely a great idea...considering the fact that at least 30,000 silk worms are killed to weave one sari.I feel really sad to note that I've been endorsing such cruelty all these years.

But all of us who are conscious need not worry any more as we now have saris which we can wear without feeling guilty.Moreover these saris are supposed to be able to let more air in and hence we wont have to sweat and wait to take it off.

An article has been published in THE HINDU

http://www.hindu.com/mp/2007/03/06/stories/2007030600230100.htm

Also they have an official website www.ahimsasilks.com

models of saris and a colour contrast chart are available.Also made to order saris are available.........Happy shopping

some more websites for viewing are
http://animalliberationfront.com/News/2006_07/Silk-ahisma.htm

http://www.aurorasilk.com/shop/fabric_ahimsa.shtml

मंगलवार, 6 मार्च 2007

मॆ ऒर मेरे खयाल

नील गगन के छाव पर ,
आए हम उड-उडकर,
पंखुडियों को धीरे से छूकर,
लाए मद-मस्ती भर भर कर,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

बादलों से जाकर लड आए,
गिरियों से जाकर टकराए,
हसीन वादियों में खो गए,
हर महफ़िल में जम गए,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

लगाए चक्कर वसुन्धरा भर में,
फूलों से रंग चुराके आए,
कोयल से गीत ह्डपके लाए,
ज़िन्दगी में जवानी भरके आए,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

ओस बनकर हम मुस्काए,
बन गए दोस्ती के किस्से,
प्रेम की अमर कहानी हो गए,
जवानी से मद-होश हो गए,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

सात सुरों में रम गए,
वीणा की तान में जम गए,
नूपुर में थिरक लाए,
आवाज़ में दर्द भर लाए,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

सचमुच सच्चे दोस्त हॆं हम,
जुदा कभी भी न होंगे हम,
साथ निभाएंगे हम हरेक दम,
इकट्ठे रहेंगे जनम-जनम,
मॆं ऒर मेरे खयाल.

रिम-झिम बरसात

बरसात आई री सखी,
धरती से मीठी महक उठी |
पेड़ों औ ' वृक्षों से धूल धुली,
पत्तिया बरसात मे चमक उठीं |
कलियाँ  ऒस से भीगी, मुस्कराने लगी,
सडक के सारे नालिया भर गयी |
बून्दे बिजलियो के कमभों  मे जा रुकी,
ज़मीन ये बहुत ही शीतल हुई.
चारों तरफ़ अन्धियारा फैल गई,
पंछियाँ सब घोंसलों मे छिप गई |
खेतों मे अनाज के पौधे चमक उठी,
कहीं से एक गीत गूँज उठी |
घरो के छतो पर बारिश हुई,
खिडकियों पर झटके से गिर आई,
चारो ओर हो गयी हरियाली ही हरियाली.
ये सब देखकर मैं पुलकित  हो उठी;
अरी सखी! सुन्दर बरसात आई!
रिम-झिम, रिम-झिम बारिश आई,
सबके मन को शीतल कर गई,
ये बरसात है बहुत ही प्यारी!
                                     - "अपराजिता"

सोमवार, 5 मार्च 2007

Here I go!!

Hello friends,

It's been a while since I wrote....But my loving sister and daughter have been after me to post my writings..or should I say my thoughts.......

I guess their love for me made me tell yes.........and here I am.

I will be posting a few of my poems which have been written during different occasions..most of them during my college days........the days which are full of dreams and every single person cherishes..........